Monday, December 28, 2009

                         इंतजार मंजिल का (WAITING FOR THE AIM)
मंजिल अब आना होगा पास चलकर तुम्हे मेरे
  थक गया हूँ बहुत मै अपनों से लढते लढते
     कमजोर हें काया टूटे हें पंख  उढ़कर आ नहीं सकता मै पास तेरे

अतीत मै हूँ रहता खोया  तेरा इंतजार करते करते  
    जब खींच सकेगा न कोई बाँहों से मुझको तेरे
         जुल्मो से ज़माने के थक गयी मेरी आत्मा रोते रोते

न कर सकेगा परताढ़ित दिल दिमाग को कोई  मेरे
  शरीर की तो हें बात कया मिटी का हें ढेला
    मिटी मै मिल जायगा फिर एक बार मरते मरते II

                            लेखक     परवीन चंदर झांझी 

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