बदलते रंग (CHANGING COLOURS)
जिन्दगी कभी हम भी जिया करते थे
रात को दिन और दिन को रात मै मिला दिया करते थे
जिन्दगी कभी हम भी जिया करते थे
यह तो थी नजाकत थी हालात की
जिसने हमे सहमा दिया
वर्ना कब हम वक़त की परवाह किया करते थे
जिन्दगी कभी हम भी जिया करते थे
घिरे रहते थे कभी रकीबो से हम
तन्हाई को हम तलाशा करते थे
अब यह आलम हें की मै हूँ और मेरी तन्हाई हें
ऐसे हालातो के तो ख्याल से भी डरा करते थे
जिन्दगी कभी हम भी जिया करते थे
जिन्दगी हें गुजारिश बस इतनी
छोढ़ोगी जब हमे आखरी मंजिल पे अपनी
कह देना बस तुम इतना नहीं था तनहा सदा मै इतना
कभी जिन्दा दिली से हम भी जिया करते थे
जिन्दगी कभी हम भी जिया करते थे
लेखक परवीन चंदर झांझी
Tuesday, December 29, 2009
प्रार्थना (REQUEST)
एक अर्सा हुआ बर्बाद हुए हम
केसे होते हें आबाद कुछ याद नहीं
कभी दूंदते थे अपने को अपनों की भीढ़ मै हम
आलम हें अब ये कि खुद से ही बेगाने हो गए हम
केसे होते हें अपने ये तो कुछ याद नहीं
अपनों के प्यार लुटाते वो हँसते मुस्कराते
कब हो गए बेगाने यह तो कुछ याद नहीं
करते थे रात दिन जो जान देने कि बाते
हो गए वो एक पल मै ही खून के वो प्यासे
बदला समय केसे यह तो कुछ याद नहीं
ऐ मालिक तुम मत ठुकरा देना
मै शरणागत हूँ तेरे कंही तुम यह कह न देना
कि कौन हो तुम मुझे तो कुछ याद नहीं II
लेखक परवीन चंदर झांझी
एक अर्सा हुआ बर्बाद हुए हम
केसे होते हें आबाद कुछ याद नहीं
कभी दूंदते थे अपने को अपनों की भीढ़ मै हम
आलम हें अब ये कि खुद से ही बेगाने हो गए हम
केसे होते हें अपने ये तो कुछ याद नहीं
अपनों के प्यार लुटाते वो हँसते मुस्कराते
कब हो गए बेगाने यह तो कुछ याद नहीं
करते थे रात दिन जो जान देने कि बाते
हो गए वो एक पल मै ही खून के वो प्यासे
बदला समय केसे यह तो कुछ याद नहीं
ऐ मालिक तुम मत ठुकरा देना
मै शरणागत हूँ तेरे कंही तुम यह कह न देना
कि कौन हो तुम मुझे तो कुछ याद नहीं II
लेखक परवीन चंदर झांझी
मकसद (AIM)
ऐ जिन्दगी क्यों हें तू मेरे साथ
तुझसे मै तेरा मकसद पूछता हूँ
वायु मै लेकर सांस खाकर तेरा अनाज मानता नहीं मै तेरी बात
तू फिर भी हें मेरे साथ आखिर क्या हें ऐसी बात
ऐ जिन्दगी क्यों हें तू मेरे साथ तुझसे मै तेरा मकसद पूछता हूँ
पुछा जो मेने फूल से क्यों हें जिन्दगी तेरे साथ
बोला वो मुझसे हंसकर देनी हें सुगंध मुझको
इसलीए जिन्दगी हें मेरे साथ
चुकाना हें उसका एहसान बढ़ाकर सुगंध अपनी
बस रात दिन मै यही बात सोचता हूँ
फिर पुछा जो पेढ़ से क्यों हें जिन्दगी तेरे साथ
खुश होकर बोल पढ़ा वो देने हें फल मुझको
जीवन का करना हें संचार
मानता हूँ मै उसका एहसान
शायद इसी लिए जिन्दगी हें मेरे साथ
पर्वत से पुछा जो तेरी जिन्दगी तो हें पहाढ़
न करता तू किसी से बात
फिर क्यों हें जिन्दगी तेरे साथ तुझसे मकसद पूछता हूँ
लेकर गहरी एक साँस बोल उठा पर्वत राज
सहोंगा नहीं जो मै हिमपात माँ वसुंधरा को कोन देगा जल की धार
येही हें मकसद मेरे पास शायद इसीलिए जिन्दगी हें मेरे साथ
फिर पूछा मेने खुद से जिन्दा हें फूल देने को सुगंध हमको
जिन्दा हें पेढ़ देने को फल हमको जिन्दा हें पर्वत देने को जल हमको
बदले मै इसके इनके दूंगा क्या मै उनको फिर भी
करते हें हम अहंकार की जिन्दगी हें हमारे साथ
मै खुद से खुद के जीने का मकसद पूछता हूँ II
लेखक परवीन चंदर झांझी
ऐ जिन्दगी क्यों हें तू मेरे साथ
तुझसे मै तेरा मकसद पूछता हूँ
वायु मै लेकर सांस खाकर तेरा अनाज मानता नहीं मै तेरी बात
तू फिर भी हें मेरे साथ आखिर क्या हें ऐसी बात
ऐ जिन्दगी क्यों हें तू मेरे साथ तुझसे मै तेरा मकसद पूछता हूँ
पुछा जो मेने फूल से क्यों हें जिन्दगी तेरे साथ
बोला वो मुझसे हंसकर देनी हें सुगंध मुझको
इसलीए जिन्दगी हें मेरे साथ
चुकाना हें उसका एहसान बढ़ाकर सुगंध अपनी
बस रात दिन मै यही बात सोचता हूँ
फिर पुछा जो पेढ़ से क्यों हें जिन्दगी तेरे साथ
खुश होकर बोल पढ़ा वो देने हें फल मुझको
जीवन का करना हें संचार
मानता हूँ मै उसका एहसान
शायद इसी लिए जिन्दगी हें मेरे साथ
पर्वत से पुछा जो तेरी जिन्दगी तो हें पहाढ़
न करता तू किसी से बात
फिर क्यों हें जिन्दगी तेरे साथ तुझसे मकसद पूछता हूँ
लेकर गहरी एक साँस बोल उठा पर्वत राज
सहोंगा नहीं जो मै हिमपात माँ वसुंधरा को कोन देगा जल की धार
येही हें मकसद मेरे पास शायद इसीलिए जिन्दगी हें मेरे साथ
फिर पूछा मेने खुद से जिन्दा हें फूल देने को सुगंध हमको
जिन्दा हें पेढ़ देने को फल हमको जिन्दा हें पर्वत देने को जल हमको
बदले मै इसके इनके दूंगा क्या मै उनको फिर भी
करते हें हम अहंकार की जिन्दगी हें हमारे साथ
मै खुद से खुद के जीने का मकसद पूछता हूँ II
लेखक परवीन चंदर झांझी
Monday, December 28, 2009
अन्गुन्तक तुम कब आओगे (UNKNOWN WHEN WILL YOU COME)
बीत गए हें वर्ष कई मन को खुश हुए
होती है ख़ुशी कैसी शायद यह भूल गया हूँ
हंसा भी कभी तो अपनी ही हंसी को
खुद ही नहीं पहचान पाया लगा कि
कोई दुखियारा शायद कुछ शणो को
अपने दुःख को भूल गया हो
समागम मै किसी गया तो यह ही महसूस हुआ
कि रिश्तो कि कढवाहट को कुछ शन को भूल गया हूँ
अब न तो खुश हूँ न दुखी हूँ
न आशावान न निराश हूँ न उत्साहित हूँ न निरउत्साहित हूँ
जिन्दगी से तटस्थ खढ़ा मै एकटक देख रहा हूँ उस राह पर
ले जाएगी मुझे उस ओर
जहाँ फिर से कुछ गम होंगे तो कुछ खुशिया भी होंगी
होंगी कुछ परेशानिया तो कुछ उत्साह भी होगा
कुछ रिश्तो कि होगी नाराजगी तो
कुछ रिश्तो की गर्मी का एहसास भी होगा
अगर आँखों मै होंगे आंसू तो होठो पर
हंसी का आगाज भी होगा मगर यह तो बताओ
की औंगुन्तक तुम कब आओंगे और बाहं पकढ़कर
उस मंजिल की तरफ कब ले जाओंगे II
लेखक परवीन चंदर झांझी
बीत गए हें वर्ष कई मन को खुश हुए
होती है ख़ुशी कैसी शायद यह भूल गया हूँ
हंसा भी कभी तो अपनी ही हंसी को
खुद ही नहीं पहचान पाया लगा कि
कोई दुखियारा शायद कुछ शणो को
अपने दुःख को भूल गया हो
समागम मै किसी गया तो यह ही महसूस हुआ
कि रिश्तो कि कढवाहट को कुछ शन को भूल गया हूँ
अब न तो खुश हूँ न दुखी हूँ
न आशावान न निराश हूँ न उत्साहित हूँ न निरउत्साहित हूँ
जिन्दगी से तटस्थ खढ़ा मै एकटक देख रहा हूँ उस राह पर
ले जाएगी मुझे उस ओर
जहाँ फिर से कुछ गम होंगे तो कुछ खुशिया भी होंगी
होंगी कुछ परेशानिया तो कुछ उत्साह भी होगा
कुछ रिश्तो कि होगी नाराजगी तो
कुछ रिश्तो की गर्मी का एहसास भी होगा
अगर आँखों मै होंगे आंसू तो होठो पर
हंसी का आगाज भी होगा मगर यह तो बताओ
की औंगुन्तक तुम कब आओंगे और बाहं पकढ़कर
उस मंजिल की तरफ कब ले जाओंगे II
लेखक परवीन चंदर झांझी
बदलती सोच (CHANGING THOUGHTS)
टूटकर नदी मै हें जब गिरती टहनिया किसी पेढ़ की
तो सोचती हें की चढ़ कर किसी लहर पर
पाकर किसी जमीन को अपनी जढ़े जमाएगी
फिर बहते बहते फंस कर किसी जंगली बेल मै
सोचती हें शायद अटक कर यही गल सढ जायगे
फिर आती हें कोई बाढ़ या सुनामी
होकर सवार ऊँची लहरों पर
अटक जाती हें ऊँचे पेढ़ पर और सोचती हें
की यहाँ पर चढ़कर अब सारे जहाँ को देख पायेगी
फिर जब चमकती हें समय की धूप उस धूप की गर्मी से
टूट जाती हें सूखकर वो फिर गिर कर ही समझ पाती हें
की मिटटी से पैदा हुई मिटटी मै मिल जाएगी II
लेखक परवीन चंदर झांझी
टूटकर नदी मै हें जब गिरती टहनिया किसी पेढ़ की
तो सोचती हें की चढ़ कर किसी लहर पर
पाकर किसी जमीन को अपनी जढ़े जमाएगी
फिर बहते बहते फंस कर किसी जंगली बेल मै
सोचती हें शायद अटक कर यही गल सढ जायगे
फिर आती हें कोई बाढ़ या सुनामी
होकर सवार ऊँची लहरों पर
अटक जाती हें ऊँचे पेढ़ पर और सोचती हें
की यहाँ पर चढ़कर अब सारे जहाँ को देख पायेगी
फिर जब चमकती हें समय की धूप उस धूप की गर्मी से
टूट जाती हें सूखकर वो फिर गिर कर ही समझ पाती हें
की मिटटी से पैदा हुई मिटटी मै मिल जाएगी II
लेखक परवीन चंदर झांझी
इंतजार मंजिल का (WAITING FOR THE AIM)
मंजिल अब आना होगा पास चलकर तुम्हे मेरे
थक गया हूँ बहुत मै अपनों से लढते लढते
कमजोर हें काया टूटे हें पंख उढ़कर आ नहीं सकता मै पास तेरे
अतीत मै हूँ रहता खोया तेरा इंतजार करते करते
जब खींच सकेगा न कोई बाँहों से मुझको तेरे
जुल्मो से ज़माने के थक गयी मेरी आत्मा रोते रोते
न कर सकेगा परताढ़ित दिल दिमाग को कोई मेरे
शरीर की तो हें बात कया मिटी का हें ढेला
मिटी मै मिल जायगा फिर एक बार मरते मरते II
लेखक परवीन चंदर झांझी
मंजिल अब आना होगा पास चलकर तुम्हे मेरे
थक गया हूँ बहुत मै अपनों से लढते लढते
कमजोर हें काया टूटे हें पंख उढ़कर आ नहीं सकता मै पास तेरे
अतीत मै हूँ रहता खोया तेरा इंतजार करते करते
जब खींच सकेगा न कोई बाँहों से मुझको तेरे
जुल्मो से ज़माने के थक गयी मेरी आत्मा रोते रोते
न कर सकेगा परताढ़ित दिल दिमाग को कोई मेरे
शरीर की तो हें बात कया मिटी का हें ढेला
मिटी मै मिल जायगा फिर एक बार मरते मरते II
लेखक परवीन चंदर झांझी
आज फिर (TODAY AGAIN)
आज फिर सपनो के गड मड होकर
याद आ गए कुछ ऐसे चहेरे
जिन्हें मै सोचना नहीं चाहता
चाहे हें वो मेरे अपने
आज फिर मेरे वर्तमान को
याद आ गए कुछ बीते हुए कल
गुम हो गया मेरा आज उस बीते हुए कल में
कयोंकि उस कल में हें मेरे कुछ टूटे हुए सपने
आज फिर क्यों नहीं हें छटता
कोहरा यह बीते कल का
क्यों नहीं हें पनपता सपना आने वाले कल का
क्या सिसकते सिसकते खो जायेगा आज मेरा
उन बीती हुई यादों के कफ़न में II
लेखक परवीन चंदर झांझी
आज फिर सपनो के गड मड होकर
याद आ गए कुछ ऐसे चहेरे
जिन्हें मै सोचना नहीं चाहता
चाहे हें वो मेरे अपने
आज फिर मेरे वर्तमान को
याद आ गए कुछ बीते हुए कल
गुम हो गया मेरा आज उस बीते हुए कल में
कयोंकि उस कल में हें मेरे कुछ टूटे हुए सपने
आज फिर क्यों नहीं हें छटता
कोहरा यह बीते कल का
क्यों नहीं हें पनपता सपना आने वाले कल का
क्या सिसकते सिसकते खो जायेगा आज मेरा
उन बीती हुई यादों के कफ़न में II
लेखक परवीन चंदर झांझी
कोई बात
मेरे लब जरा से क्या हिले
तो ये चर्चे सरे आम हो गए की हम मुस्करा दिए
मगर मेरी पलकों मै छिपी नमी की
तो कहीं बात नहीं हुई
मेरी नफरत को तो
सरे जहाँ ने देखा
कितनी करते थे मुहबत
इसकी तो कही बात ही नहीं हुई
उन कारणों की तो हुई हर तरफ बात
की केसे हुए हम बर्बाद
पर कितनो को हमने है किया आबाद
इसकी तो कही बात ही नहीं हुई
हमारी बेरुखी को देखा है दिन मै सबने
चाहे वो थे पराये या थे वो अपने
मगर केसे गुजारी है हमने रात
इसकी तो कही कोई बात नहीं हुई
अरे आ जाते तुम कभी हमारे पास
रखकर कांधे पर मेरे हाथ
महज कह देते इतनी बात
मत घबरा मै हूँ तेरे साथ
तो शायद हम भी कह पाते
चलो यह तो कोई बात भी हुई
लेखक परवीन चंदर झांझी
मेरे लब जरा से क्या हिले
तो ये चर्चे सरे आम हो गए की हम मुस्करा दिए
मगर मेरी पलकों मै छिपी नमी की
तो कहीं बात नहीं हुई
मेरी नफरत को तो
सरे जहाँ ने देखा
कितनी करते थे मुहबत
इसकी तो कही बात ही नहीं हुई
उन कारणों की तो हुई हर तरफ बात
की केसे हुए हम बर्बाद
पर कितनो को हमने है किया आबाद
इसकी तो कही बात ही नहीं हुई
हमारी बेरुखी को देखा है दिन मै सबने
चाहे वो थे पराये या थे वो अपने
मगर केसे गुजारी है हमने रात
इसकी तो कही कोई बात नहीं हुई
अरे आ जाते तुम कभी हमारे पास
रखकर कांधे पर मेरे हाथ
महज कह देते इतनी बात
मत घबरा मै हूँ तेरे साथ
तो शायद हम भी कह पाते
चलो यह तो कोई बात भी हुई
लेखक परवीन चंदर झांझी
सचा साथी
चिता पर लेटे इन्सान से
कहा लकढ़ी ने यू हंसकर
तोढ़ कर पढ़ से मुझको
बहूत इतराता था तू
याद कर
केसे काटा मुझे तुने
सुखाया मुझे तुने
आ लेटा हें यहाँ सब दुनिया छोढ़कर
करके आग के हवाले
चले रिश्ते दार ये घरवाले
रहूंगी साथ मै तेरे जलूँगी साथ मै तेरे
राख बनकर भी रहूंगी मै साथ तेरे
तेरी यात्रा के इस अंतिम मोढ़ तक
लेखक परवीन चंदर झांझी
चिता पर लेटे इन्सान से
कहा लकढ़ी ने यू हंसकर
तोढ़ कर पढ़ से मुझको
बहूत इतराता था तू
याद कर
केसे काटा मुझे तुने
सुखाया मुझे तुने
आ लेटा हें यहाँ सब दुनिया छोढ़कर
करके आग के हवाले
चले रिश्ते दार ये घरवाले
रहूंगी साथ मै तेरे जलूँगी साथ मै तेरे
राख बनकर भी रहूंगी मै साथ तेरे
तेरी यात्रा के इस अंतिम मोढ़ तक
लेखक परवीन चंदर झांझी
जी नहीं चाहता
कुछ इस तरह दुनिया ने किया बर्बाद हमको
की अब तो आबाद होने को भी जी नहीं चाहता
बेरुखी से इस तरह मुह फेरा अपनों ने
की अब तो आवाज़ देने को भी जी नहीं चाहता
होना था हमे वहां जा बेठे हो तुम जहाँ
अब दूर हो इतनी की पास आने को भी जी नहीं चाहता
नजरो मै तेरी है शर्मिंदगी इतनी की
तुमसे तो अब नज़र मिलाने को भी जी नहीं चाहता
पढ़ेगी मौत जब भारी जाना है सब को अपनी अपनी बारी
मिले फिर कभी हम एसा सोचने को भी जी नहीं चाहता
लेखक परवीन चंदर झांझी
कुछ इस तरह दुनिया ने किया बर्बाद हमको
की अब तो आबाद होने को भी जी नहीं चाहता
बेरुखी से इस तरह मुह फेरा अपनों ने
की अब तो आवाज़ देने को भी जी नहीं चाहता
होना था हमे वहां जा बेठे हो तुम जहाँ
अब दूर हो इतनी की पास आने को भी जी नहीं चाहता
नजरो मै तेरी है शर्मिंदगी इतनी की
तुमसे तो अब नज़र मिलाने को भी जी नहीं चाहता
पढ़ेगी मौत जब भारी जाना है सब को अपनी अपनी बारी
मिले फिर कभी हम एसा सोचने को भी जी नहीं चाहता
लेखक परवीन चंदर झांझी
अतृप्त आकांशा
जाती हो भूल जब मर्यादाए ज़माने की
भिखर जाती हो ऊपर मेरे बनकर ग्रीषम रात की चांदनी सी
करती हो याद जब मर्यादा समाज की
ठिठुर जाती हो शरद ऋतू धूप सी
लाने को मुझे भी उन मर्यादाओ मै समाज की
डरा देती हो मुझको चमक कर बिजली सी बरसात की
चलती रही जो कश म कश इसी तरह
तो तह उम्र हम इस रिश्ते को कोई नाम न दे सकेंगे
बिना जोढ़े या तोढ़े इस बेनाम रिश्ते को
बिछढ़ जायगे हम शायद किसी दिन एक अँधेरे मोढ़ पर
मगर है यह आकांशा दिल की
शायद किसी और युग मै किसी और जमीन पर
कभी हम इस अनाम रिश्ते को
कोई नाम दे सके
लेखक परवीन चंदर झांझी
जाती हो भूल जब मर्यादाए ज़माने की
भिखर जाती हो ऊपर मेरे बनकर ग्रीषम रात की चांदनी सी
करती हो याद जब मर्यादा समाज की
ठिठुर जाती हो शरद ऋतू धूप सी
लाने को मुझे भी उन मर्यादाओ मै समाज की
डरा देती हो मुझको चमक कर बिजली सी बरसात की
चलती रही जो कश म कश इसी तरह
तो तह उम्र हम इस रिश्ते को कोई नाम न दे सकेंगे
बिना जोढ़े या तोढ़े इस बेनाम रिश्ते को
बिछढ़ जायगे हम शायद किसी दिन एक अँधेरे मोढ़ पर
मगर है यह आकांशा दिल की
शायद किसी और युग मै किसी और जमीन पर
कभी हम इस अनाम रिश्ते को
कोई नाम दे सके
लेखक परवीन चंदर झांझी
Thursday, December 24, 2009
किस्मत फूल की
बदकिस्मत है वो फूल
जो गिरकर किसी डाली से
बन गया शरदा सुमन किसी शव का
खुश किस्मत है वो फूल
जो टूटा तो किसी डाली से
मगर सजकर किसी दुल्हन के जुढ़े मै महक गया
है फितरत फूल की बिखेरना सुगंध
चाहे वो छुपाये दुर्गन्ध किसी शव की
या किसी दुल्हन के रूप को महकाने की हो
खोकर सुगंध कुचला जाना है नियति उसकी
वो बिस्तर किसी दुल्हन का हो
या फिर जगह किसी शव के दफ़नाने की हो
गुजरती क्या होगी
उस टूटे मुरझाये तनहा फूल पर
इसकी चिंता क्यों इस बदगुमान ज़माने को हो
है ज़माने की नज़र मै
फूल की किस्मत यही
फिर दुःख क्यों उसके टूट कर कुम्लाह्कर मुरझा जाने मै हो
लेखक परवीन चंदर झांझी
बदकिस्मत है वो फूल
जो गिरकर किसी डाली से
बन गया शरदा सुमन किसी शव का
खुश किस्मत है वो फूल
जो टूटा तो किसी डाली से
मगर सजकर किसी दुल्हन के जुढ़े मै महक गया
है फितरत फूल की बिखेरना सुगंध
चाहे वो छुपाये दुर्गन्ध किसी शव की
या किसी दुल्हन के रूप को महकाने की हो
खोकर सुगंध कुचला जाना है नियति उसकी
वो बिस्तर किसी दुल्हन का हो
या फिर जगह किसी शव के दफ़नाने की हो
गुजरती क्या होगी
उस टूटे मुरझाये तनहा फूल पर
इसकी चिंता क्यों इस बदगुमान ज़माने को हो
है ज़माने की नज़र मै
फूल की किस्मत यही
फिर दुःख क्यों उसके टूट कर कुम्लाह्कर मुरझा जाने मै हो
लेखक परवीन चंदर झांझी
किरदार
निकल चुका हो जो पत्ता भंवर से
वो तो जवारभाटे को भी एक लहर समझता है
नदी की शांत लहरों मै बहती आयी टहनी
समुंदर की लहरों को ही तूफ़ान समझती है
ओ महलो मै रहने वालो
तुम क्या जानो क्या होती है भूख
तुम तो बस इसे भी
लफ्फाजी की एक दास्तान समझते हो
क्या है पेट की आग समझता है इन्सान तब
जब उसके अपने हालात बदलते है
अमीर गरीब के रिश्ते कभी नहीं बदलते
बदलते है तो बस नाटक के किरदार बदलते है II
लेखक परवीन चंदर झांजी
पहचान
ऐ ज़माने मत कर जुलम इतना
की तेरा जुलम हद से गुजर जाय
याद रखो की हद की दुनिया के पार
कुछ ऐसे सिरफिरे इन्सान होते है
वो खुद मै होते है तनहा इतने
की वो खुद ही खुद के भगवान होते है
अरे क्या मारेगा कोई उनको
वो तो खुद ही चलते फिरते शमशान होते है
जो उठाये फिरते है राख
कुछ यादों की अधजली लाशो की
बस उनकी पहचान तो
उनके कदमो के निशान होते है II
लेखक परवीन चंदर झांझी
निकल चुका हो जो पत्ता भंवर से
वो तो जवारभाटे को भी एक लहर समझता है
नदी की शांत लहरों मै बहती आयी टहनी
समुंदर की लहरों को ही तूफ़ान समझती है
ओ महलो मै रहने वालो
तुम क्या जानो क्या होती है भूख
तुम तो बस इसे भी
लफ्फाजी की एक दास्तान समझते हो
क्या है पेट की आग समझता है इन्सान तब
जब उसके अपने हालात बदलते है
अमीर गरीब के रिश्ते कभी नहीं बदलते
बदलते है तो बस नाटक के किरदार बदलते है II
लेखक परवीन चंदर झांजी
पहचान
ऐ ज़माने मत कर जुलम इतना
की तेरा जुलम हद से गुजर जाय
याद रखो की हद की दुनिया के पार
कुछ ऐसे सिरफिरे इन्सान होते है
वो खुद मै होते है तनहा इतने
की वो खुद ही खुद के भगवान होते है
अरे क्या मारेगा कोई उनको
वो तो खुद ही चलते फिरते शमशान होते है
जो उठाये फिरते है राख
कुछ यादों की अधजली लाशो की
बस उनकी पहचान तो
उनके कदमो के निशान होते है II
लेखक परवीन चंदर झांझी
एक वेश्या कि हार
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लढ़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
जिन्दगी तो है एक वेश्या कि तरह
कभी हसंती कभी इतराती पास अपने बुलाती है
कभी हसांती कभी रुलाती और कभी रूठ जाती है
मौत है पतिव्रता नारी
एक बार जो आ जाए तो फिर कही नहीं जाती है
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लढ़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
जिन्दगी चढ़ा था कोठे पर तेरे
लेकर अरमान और हसीन सपने
खूब भटकाया बहलाया फुसलाया तुने
और अब ये है आलम कि आई जब जाने कि बारी
तो नहीं है कुछ पास अपने
और मौत है इतनी भोली
कि फिर ले लिया मुझको आँचल में उसने अपने
जबकि है पास मेरे
सिर्फ कुछ भूली सी यादें या है कुछ टूटे सपने
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लढ़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
जिन्दगी आया था जब पास तेरे
था एक सुंदर बढ़ता शरीर पास मेरे
कुछ जिन्दादिली के अरमान थे
थे कुछ कर दीखाने के सपने
खूब नाच दिखाए तुने
खूब आँचल लहराए अपने
कभी झन झन करके आई
कभी छुप गयी दिखाकर जलवे अपने
खूब ललचाया भरमाया हमको बजाकर गुन्गरू अपने
अब हूँ जब लाचार बेकार मै तो उत्तार दिया मुझको कोठे से तुने अपने
है मौत अर्धांगनी मेरी
करती है मुजको अब भी अंगीकार
बूढ़ा हूँ लाचार शक्तिवहीँन हूँ करती है फिर भी मुजको वो आज भी सवीकार
समेटती है बाँहों मै अपनी करती नहीं है निराश
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लढ़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
याद रखना थका हुआ हूँ हारा नहीं हूँ
परेशांन हूँ मगर बेचारा नहीं हूँ
तेरे जुल्मो से झूका हुआ हूँ दुखियारा नहीं हूँ
एक दिन सबक जरूर तुम्हे सिखाऊंगा
जायूँगा जब पास मौत के तुझे साथ लेकर जायूँगा
सामने दुनिया के देखना
इस वेश्या को पत्नी से जरूर हरवाऊंगा
जिन्दगी(वेश्या) बहुत थक गया हू मै लढ़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
लेखक परवीन चंदर झांजी
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लढ़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
जिन्दगी तो है एक वेश्या कि तरह
कभी हसंती कभी इतराती पास अपने बुलाती है
कभी हसांती कभी रुलाती और कभी रूठ जाती है
मौत है पतिव्रता नारी
एक बार जो आ जाए तो फिर कही नहीं जाती है
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लढ़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
जिन्दगी चढ़ा था कोठे पर तेरे
लेकर अरमान और हसीन सपने
खूब भटकाया बहलाया फुसलाया तुने
और अब ये है आलम कि आई जब जाने कि बारी
तो नहीं है कुछ पास अपने
और मौत है इतनी भोली
कि फिर ले लिया मुझको आँचल में उसने अपने
जबकि है पास मेरे
सिर्फ कुछ भूली सी यादें या है कुछ टूटे सपने
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लढ़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
जिन्दगी आया था जब पास तेरे
था एक सुंदर बढ़ता शरीर पास मेरे
कुछ जिन्दादिली के अरमान थे
थे कुछ कर दीखाने के सपने
खूब नाच दिखाए तुने
खूब आँचल लहराए अपने
कभी झन झन करके आई
कभी छुप गयी दिखाकर जलवे अपने
खूब ललचाया भरमाया हमको बजाकर गुन्गरू अपने
अब हूँ जब लाचार बेकार मै तो उत्तार दिया मुझको कोठे से तुने अपने
है मौत अर्धांगनी मेरी
करती है मुजको अब भी अंगीकार
बूढ़ा हूँ लाचार शक्तिवहीँन हूँ करती है फिर भी मुजको वो आज भी सवीकार
समेटती है बाँहों मै अपनी करती नहीं है निराश
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लढ़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
याद रखना थका हुआ हूँ हारा नहीं हूँ
परेशांन हूँ मगर बेचारा नहीं हूँ
तेरे जुल्मो से झूका हुआ हूँ दुखियारा नहीं हूँ
एक दिन सबक जरूर तुम्हे सिखाऊंगा
जायूँगा जब पास मौत के तुझे साथ लेकर जायूँगा
सामने दुनिया के देखना
इस वेश्या को पत्नी से जरूर हरवाऊंगा
जिन्दगी(वेश्या) बहुत थक गया हू मै लढ़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है
लेखक परवीन चंदर झांजी
Wednesday, December 23, 2009
`शून्य
देखता हूँ मुढ़कर
जिन्दगी कि उस सढ़क पर
पहुंचा हूँ चलकर जिस पर
आज इस मुकाम पर
नज़र आती है बिखरी दूर तक
झाढ़िया बदनामी रिश्तो गमो कि
जो थे कभी मेरे व्यक्तित्व के
एक अटूट अभिन्न हिस्सा
बचा है पास मेरे
जिस्म टूटा बूढ़ा सा
बसी है जिसमे बस एक
आत्मा टूटी रोती सी
चाहता हू पाना छुटकारा
उन भूली बिसरी यादों से
जो देती है न जीने हमको
न देती है मरने हमको
चाहता हँ दिल कि जल्दी
मिल जय वो आग हमको
जो जला दे साथ मेरे
इन रिश्तो कि गन्दी बदबू को
रह जाय देखती दुनिया
जाते हुए एक शून्य में हमको.
लेखक परवीन चंदर झांजी
अंतहीन ख़ामोशी
बनाया था जिन्होंने तमाशा हमारा
वो आज खुद तमाशा बने खढ़े है
दोराहे पर था धकेला हमे जिन्होंने
वो आज खुद चोराहे पर खढ़े है
खूब उढ़ी थी हंसी हमारी
हम बेबसी के आंसू चुपचाप पीकर रह गए
जब आई बारी अपनी
वो तो अभी से घबरा गए
बर्बादी निराशा बेबसी के
जिस गढ़ढ़े में हमे था धकेला
उस गढ़ढ़े की तुमने तो अभी
बस एक झलक ही है पाई
होगे तरह हमारे
बर्बाद एक दिन तुम भी
पाओगे समज उस दिन
है कितनी गहरी ये खाई
लेगी जब घेर तुमको भी
बर्फ अतीत की यादों की
मांगोगे तुम भी उस दिन
बस एक अंत हीन ख़ामोशी ख़ामोशी ख़ामोशी II
लेखक परवीन चंदर झांजी
देखता हूँ मुढ़कर
जिन्दगी कि उस सढ़क पर
पहुंचा हूँ चलकर जिस पर
आज इस मुकाम पर
नज़र आती है बिखरी दूर तक
झाढ़िया बदनामी रिश्तो गमो कि
जो थे कभी मेरे व्यक्तित्व के
एक अटूट अभिन्न हिस्सा
बचा है पास मेरे
जिस्म टूटा बूढ़ा सा
बसी है जिसमे बस एक
आत्मा टूटी रोती सी
चाहता हू पाना छुटकारा
उन भूली बिसरी यादों से
जो देती है न जीने हमको
न देती है मरने हमको
चाहता हँ दिल कि जल्दी
मिल जय वो आग हमको
जो जला दे साथ मेरे
इन रिश्तो कि गन्दी बदबू को
रह जाय देखती दुनिया
जाते हुए एक शून्य में हमको.
लेखक परवीन चंदर झांजी
अंतहीन ख़ामोशी
बनाया था जिन्होंने तमाशा हमारा
वो आज खुद तमाशा बने खढ़े है
दोराहे पर था धकेला हमे जिन्होंने
वो आज खुद चोराहे पर खढ़े है
खूब उढ़ी थी हंसी हमारी
हम बेबसी के आंसू चुपचाप पीकर रह गए
जब आई बारी अपनी
वो तो अभी से घबरा गए
बर्बादी निराशा बेबसी के
जिस गढ़ढ़े में हमे था धकेला
उस गढ़ढ़े की तुमने तो अभी
बस एक झलक ही है पाई
होगे तरह हमारे
बर्बाद एक दिन तुम भी
पाओगे समज उस दिन
है कितनी गहरी ये खाई
लेगी जब घेर तुमको भी
बर्फ अतीत की यादों की
मांगोगे तुम भी उस दिन
बस एक अंत हीन ख़ामोशी ख़ामोशी ख़ामोशी II
लेखक परवीन चंदर झांजी
Tuesday, December 22, 2009
Khoj aur Kapana ki ek manzil
खोज
नदी के किनारे, पहाढ़ पर उगें एक पेढ़ की डाली,
झुक कर बहते पानी को छूने की कोशिश करती है, फिर डर जाती है,
ठीक उस नटखट बालक की तरह, जो आग को छूने की कोशश तो करता है,
मगर उसकी तेजी से डर जाता है.
मगर भूल जाती है ये डाली , भूल जाती है उसके ये पत्ते
की अंत में सूखकर एक दिन एक हवा के झोंके ने गिरा देना है उनेह इसी नदी में
और उनेह बहकर नदी की धारा के साथ, चल देना होगा खोज में ,
एक अनजान सागर की गोद में.
लेखक : परवीन चंदर झांजी
कल्पना की एक मंजिल
शिमला के माल रोड पर झिन्दगी चहक रही थी
बचपन खेल रहा था जवानी दौढ रही थी
अधेढ़ अवस्था ठहर गई थी बुढ़ापा सहम गया था
मै सतब्ध रह गया जब आसमान से बादल उतरें
और नीचे घाटी में बिखर गए, मै हैरान था कि
अब कल्पना में उढ़कर किसे पकढ़ोगा क्योंकि
क्योंकि बादलो के पार तो मै एक शून्य सा आसमान देखता हूँ
अब तलाशनी होगी मुझे जीने के लिए एक कल्पना की एक नै मंजिल.
लेखक : परवीन चंदर झांजी
नदी के किनारे, पहाढ़ पर उगें एक पेढ़ की डाली,
झुक कर बहते पानी को छूने की कोशिश करती है, फिर डर जाती है,
ठीक उस नटखट बालक की तरह, जो आग को छूने की कोशश तो करता है,
मगर उसकी तेजी से डर जाता है.
मगर भूल जाती है ये डाली , भूल जाती है उसके ये पत्ते
की अंत में सूखकर एक दिन एक हवा के झोंके ने गिरा देना है उनेह इसी नदी में
और उनेह बहकर नदी की धारा के साथ, चल देना होगा खोज में ,
एक अनजान सागर की गोद में.
लेखक : परवीन चंदर झांजी
कल्पना की एक मंजिल
शिमला के माल रोड पर झिन्दगी चहक रही थी
बचपन खेल रहा था जवानी दौढ रही थी
अधेढ़ अवस्था ठहर गई थी बुढ़ापा सहम गया था
मै सतब्ध रह गया जब आसमान से बादल उतरें
और नीचे घाटी में बिखर गए, मै हैरान था कि
अब कल्पना में उढ़कर किसे पकढ़ोगा क्योंकि
क्योंकि बादलो के पार तो मै एक शून्य सा आसमान देखता हूँ
अब तलाशनी होगी मुझे जीने के लिए एक कल्पना की एक नै मंजिल.
लेखक : परवीन चंदर झांजी
स्वार्थी
बनाया था शाहजहाँ ने
याद में मुमताज के एक ताज
अपने पर उसको नहीं था उसको यह विश्वास
कि बाद मरने के भी कर पायेगा उसे प्यार
मेने भी दिल में अपने बनाया है इक ताज
जलकर जो संग मेरे हो जायगा इक दिन राख
स्वार्थी हु मै शायद इतना कि चाहता नहीं ये बात
के बाद मरने के भी मेरे करे कोई तुमको याद.
लेखक परवीन चंदर झांजी
बनाया था शाहजहाँ ने
याद में मुमताज के एक ताज
अपने पर उसको नहीं था उसको यह विश्वास
कि बाद मरने के भी कर पायेगा उसे प्यार
मेने भी दिल में अपने बनाया है इक ताज
जलकर जो संग मेरे हो जायगा इक दिन राख
स्वार्थी हु मै शायद इतना कि चाहता नहीं ये बात
के बाद मरने के भी मेरे करे कोई तुमको याद.
लेखक परवीन चंदर झांजी
मन की गुथी
बादल की तरह कभी आती हो,
धुन्द बनकर कभी लिपट जाती हो
धूप बनकर कभी चमकती हो
सूरज सी कभी गरमा जाती हो
मन पीछे हटने नहीं देता
आगे बढ़ने का तुम साहस नहीं देती
मै तो हूँ हैरान परेशान
की तुमसे कुछ कह क्यों नहीं पाता
शायद तुम्हरी न का डर
कही मुझे डरा जाता है
काश कुछ तुम कह पाती
कुछ मै समज पाता
फिर भी मुझे खुश करने को तो
काफी है यह एहसास भी
की कुछ तो है हमारे बीच
जो कही न कही हमे आपस में जोढ़ता है
एक आशा सी है मन में मेरे
कि कभी तो तुम खोलोगी गुथी अपने मन की
और मै यह समज पाउँगा कि आखिर
हम आपके है कौन.
लेखक परवीन चंदर झांजी
बादल की तरह कभी आती हो,
धुन्द बनकर कभी लिपट जाती हो
धूप बनकर कभी चमकती हो
सूरज सी कभी गरमा जाती हो
मन पीछे हटने नहीं देता
आगे बढ़ने का तुम साहस नहीं देती
मै तो हूँ हैरान परेशान
की तुमसे कुछ कह क्यों नहीं पाता
शायद तुम्हरी न का डर
कही मुझे डरा जाता है
काश कुछ तुम कह पाती
कुछ मै समज पाता
फिर भी मुझे खुश करने को तो
काफी है यह एहसास भी
की कुछ तो है हमारे बीच
जो कही न कही हमे आपस में जोढ़ता है
एक आशा सी है मन में मेरे
कि कभी तो तुम खोलोगी गुथी अपने मन की
और मै यह समज पाउँगा कि आखिर
हम आपके है कौन.
लेखक परवीन चंदर झांजी
जीवन चक्र
मै भी था एक बढ़े पेढ़ कि मजबूत शाखा
मुझ पर खूब पते लगते थे
ठंडी हवा के झोंके मुझे सहला जाते थे
ओस कि बूंदे मुझे गुदगुदा जाती थी
फूलो के आते ही चहचाहते थे मुझ पर पते
देखकर ख़ुशी उनकी
मेरे चहेरे पर भी मुस्कराहट आती थी
कभी कभी छोटी सी पतजढ़ के बाद
एक लम्भी बहार मुझे बहला जाती थी
मगर नियति कि क्रूर नज़र पढ़ी जब मुझपर
एक दुष्ट लकढ़हारे न कर दिया मुझे पेढ़ से अलग
बदल कर शाखा से बन गया में काठ
अब न सहलाता था कोई हवा का झोंका
न ओस कि बूंदे मुझे सहलाती थी
तभी तराश कर किसी मूर्ति कार न
कर दिया उस काठ को कठपुतली
और थमा दी ढोर मेरी एक बाज़ीगर के हाथ में
देखा करता हु निर्विकार भाव से
सामने बेठे उन तमाश बीनो को
जो देख मुझे तमाशा बने खुश होते है खूब
इंतजार है बस उस दिन का जब यह
बाज़ीगर और तमाशबीन जायगे मुझ से उब
फ़ेंक देंगे ये मुझे समजकर बेकार
जला देगा कोई मुझे कुढ़I समज कर
मिल जाऊंगा मिटटी में मै बनकर राख
चाहुगा मै कि फिर गिरे कोई बीज उस मिटटी में
बनकर खाद करू मै उस बीज मै जीवन का संचार.
लेखक परवीन चंदर झांजी
मै भी था एक बढ़े पेढ़ कि मजबूत शाखा
मुझ पर खूब पते लगते थे
ठंडी हवा के झोंके मुझे सहला जाते थे
ओस कि बूंदे मुझे गुदगुदा जाती थी
फूलो के आते ही चहचाहते थे मुझ पर पते
देखकर ख़ुशी उनकी
मेरे चहेरे पर भी मुस्कराहट आती थी
कभी कभी छोटी सी पतजढ़ के बाद
एक लम्भी बहार मुझे बहला जाती थी
मगर नियति कि क्रूर नज़र पढ़ी जब मुझपर
एक दुष्ट लकढ़हारे न कर दिया मुझे पेढ़ से अलग
बदल कर शाखा से बन गया में काठ
अब न सहलाता था कोई हवा का झोंका
न ओस कि बूंदे मुझे सहलाती थी
तभी तराश कर किसी मूर्ति कार न
कर दिया उस काठ को कठपुतली
और थमा दी ढोर मेरी एक बाज़ीगर के हाथ में
देखा करता हु निर्विकार भाव से
सामने बेठे उन तमाश बीनो को
जो देख मुझे तमाशा बने खुश होते है खूब
इंतजार है बस उस दिन का जब यह
बाज़ीगर और तमाशबीन जायगे मुझ से उब
फ़ेंक देंगे ये मुझे समजकर बेकार
जला देगा कोई मुझे कुढ़I समज कर
मिल जाऊंगा मिटटी में मै बनकर राख
चाहुगा मै कि फिर गिरे कोई बीज उस मिटटी में
बनकर खाद करू मै उस बीज मै जीवन का संचार.
लेखक परवीन चंदर झांजी
गुजरी राहें
उड़ते थे कभी हम भी होकर सवार कल्पना के घोड़े पर
पड़ते नहीं थे पावं जमीन पर, सोते थे हम आकांशाओ कि नरम शाया पर
समय के चक्रवात के आकर कुछ इस तरह फंसे जिन्दगी के रेगिस्तान में
कि अब यह आलम है न सपने हे न आकांशा हे न तमन्ना हे
मुढ़कर भी जब देखते है गुजरी राहों पर
तो नहीं मिलते अपने पेरों के निशान भी उनपर.
लेखक परवीन चंदर झांजी
खून के रिश्ते
न खुद पर रोये न हालत पर रोये
यह तो अपनों कि बेवफाई थी जिसने हमें रुला दिया
लढ तो हम अब भी रहे है उन दुश्मनों से
जो हुए खढ़े अपनों के पैदा किये हालातो से
हम तो बस छुढ़I रहे है अपने को उन काँटों से
जिस केक्टुस कि जढ़ों में हमे अब भी कुछ अपने बेठे नज़र आते है
हम अब नहीं जुटा पाते साहस उन जढ़ों को खोदने का
क्योंकि उन अपनों के चेरहे फिर सामने खढ़े हो जाते है
मन तो बस यह चाहता है कि जल जाये वो अपने ही जहर से
मुझे तो बस मिल जाये निजात इन हालात से
न तो उन्हें अपना कह पाता हूँ न इन रिश्तो को भुला पाता हूँ
अगर होते है यही खून के रिश्ते
तो ऐ खुदा मुझे ऐसी जमीन देना
जहाँ के लोगो में खून न हो.
लेखक परवीन चंदर झांजी
उड़ते थे कभी हम भी होकर सवार कल्पना के घोड़े पर
पड़ते नहीं थे पावं जमीन पर, सोते थे हम आकांशाओ कि नरम शाया पर
समय के चक्रवात के आकर कुछ इस तरह फंसे जिन्दगी के रेगिस्तान में
कि अब यह आलम है न सपने हे न आकांशा हे न तमन्ना हे
मुढ़कर भी जब देखते है गुजरी राहों पर
तो नहीं मिलते अपने पेरों के निशान भी उनपर.
लेखक परवीन चंदर झांजी
खून के रिश्ते
न खुद पर रोये न हालत पर रोये
यह तो अपनों कि बेवफाई थी जिसने हमें रुला दिया
लढ तो हम अब भी रहे है उन दुश्मनों से
जो हुए खढ़े अपनों के पैदा किये हालातो से
हम तो बस छुढ़I रहे है अपने को उन काँटों से
जिस केक्टुस कि जढ़ों में हमे अब भी कुछ अपने बेठे नज़र आते है
हम अब नहीं जुटा पाते साहस उन जढ़ों को खोदने का
क्योंकि उन अपनों के चेरहे फिर सामने खढ़े हो जाते है
मन तो बस यह चाहता है कि जल जाये वो अपने ही जहर से
मुझे तो बस मिल जाये निजात इन हालात से
न तो उन्हें अपना कह पाता हूँ न इन रिश्तो को भुला पाता हूँ
अगर होते है यही खून के रिश्ते
तो ऐ खुदा मुझे ऐसी जमीन देना
जहाँ के लोगो में खून न हो.
लेखक परवीन चंदर झांजी
Thursday, November 26, 2009
SEHAR
न तू मैं हूँ जलती आग,
जिससे तुम भूल जाओ
मैं तो हूँ एक एक गीली जलती लकढ़ी ,
मेरे जलाए जाने का एहसास मुझे बुझने नहीं देता,
तुम्हे मेरे जलने का अहसास
कभी सोने नहीं देता ,
मै रात भर जलकर भी बुझ नहीं पाया ,
मुझे देखकर जलता तुम ,
रात भर जग कर सो नही पाए ,
बस इसी कशमश मे जिन्दगी की सेहर हो गयी.
जिससे तुम जल जाओ
न मैं हूँ बुझी राखजिससे तुम भूल जाओ
मैं तो हूँ एक एक गीली जलती लकढ़ी ,
मेरे जलाए जाने का एहसास मुझे बुझने नहीं देता,
तुम्हे मेरे जलने का अहसास
कभी सोने नहीं देता ,
मै रात भर जलकर भी बुझ नहीं पाया ,
मुझे देखकर जलता तुम ,
रात भर जग कर सो नही पाए ,
बस इसी कशमश मे जिन्दगी की सेहर हो गयी.
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