कोई बात
मेरे लब जरा से क्या हिले
तो ये चर्चे सरे आम हो गए की हम मुस्करा दिए
मगर मेरी पलकों मै छिपी नमी की
तो कहीं बात नहीं हुई
मेरी नफरत को तो
सरे जहाँ ने देखा
कितनी करते थे मुहबत
इसकी तो कही बात ही नहीं हुई
उन कारणों की तो हुई हर तरफ बात
की केसे हुए हम बर्बाद
पर कितनो को हमने है किया आबाद
इसकी तो कही बात ही नहीं हुई
हमारी बेरुखी को देखा है दिन मै सबने
चाहे वो थे पराये या थे वो अपने
मगर केसे गुजारी है हमने रात
इसकी तो कही कोई बात नहीं हुई
अरे आ जाते तुम कभी हमारे पास
रखकर कांधे पर मेरे हाथ
महज कह देते इतनी बात
मत घबरा मै हूँ तेरे साथ
तो शायद हम भी कह पाते
चलो यह तो कोई बात भी हुई
लेखक परवीन चंदर झांझी
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment