अतृप्त आकांशा
जाती हो भूल जब मर्यादाए ज़माने की
भिखर जाती हो ऊपर मेरे बनकर ग्रीषम रात की चांदनी सी
करती हो याद जब मर्यादा समाज की
ठिठुर जाती हो शरद ऋतू धूप सी
लाने को मुझे भी उन मर्यादाओ मै समाज की
डरा देती हो मुझको चमक कर बिजली सी बरसात की
चलती रही जो कश म कश इसी तरह
तो तह उम्र हम इस रिश्ते को कोई नाम न दे सकेंगे
बिना जोढ़े या तोढ़े इस बेनाम रिश्ते को
बिछढ़ जायगे हम शायद किसी दिन एक अँधेरे मोढ़ पर
मगर है यह आकांशा दिल की
शायद किसी और युग मै किसी और जमीन पर
कभी हम इस अनाम रिश्ते को
कोई नाम दे सके
लेखक परवीन चंदर झांझी
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