Thursday, December 24, 2009

                                     किरदार
निकल चुका हो जो पत्ता भंवर से
   वो तो जवारभाटे को भी एक लहर समझता है
नदी की शांत लहरों मै बहती आयी टहनी
  समुंदर की लहरों को ही तूफ़ान समझती  है
ओ महलो मै रहने वालो
  तुम क्या जानो क्या होती है भूख
तुम तो बस इसे भी
   लफ्फाजी की एक दास्तान समझते हो
क्या है पेट की आग समझता है इन्सान तब
    जब उसके अपने हालात बदलते है
अमीर गरीब के रिश्ते कभी नहीं बदलते
   बदलते है तो बस नाटक के किरदार बदलते है II

                          लेखक   परवीन चंदर झांजी

                                        पहचान

ऐ ज़माने मत कर जुलम इतना
    की तेरा जुलम हद से गुजर जाय
याद रखो की हद की दुनिया के पार
   कुछ ऐसे सिरफिरे इन्सान होते है
वो खुद मै होते है तनहा इतने
  की वो खुद ही खुद के भगवान होते है
अरे क्या मारेगा कोई उनको
  वो तो खुद ही चलते फिरते शमशान होते है
जो उठाये फिरते है राख
   कुछ यादों की अधजली लाशो की
बस उनकी पहचान तो
उनके कदमो के निशान होते है II

                      लेखक    परवीन चंदर झांझी
          

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