मन की गुथी
बादल की तरह कभी आती हो,
धुन्द बनकर कभी लिपट जाती हो
धूप बनकर कभी चमकती हो
सूरज सी कभी गरमा जाती हो
मन पीछे हटने नहीं देता
आगे बढ़ने का तुम साहस नहीं देती
मै तो हूँ हैरान परेशान
की तुमसे कुछ कह क्यों नहीं पाता
शायद तुम्हरी न का डर
कही मुझे डरा जाता है
काश कुछ तुम कह पाती
कुछ मै समज पाता
फिर भी मुझे खुश करने को तो
काफी है यह एहसास भी
की कुछ तो है हमारे बीच
जो कही न कही हमे आपस में जोढ़ता है
एक आशा सी है मन में मेरे
कि कभी तो तुम खोलोगी गुथी अपने मन की
और मै यह समज पाउँगा कि आखिर
हम आपके है कौन.
लेखक परवीन चंदर झांजी
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