बदलती सोच (CHANGING THOUGHTS)
टूटकर नदी मै हें जब गिरती टहनिया किसी पेढ़ की
तो सोचती हें की चढ़ कर किसी लहर पर
पाकर किसी जमीन को अपनी जढ़े जमाएगी
फिर बहते बहते फंस कर किसी जंगली बेल मै
सोचती हें शायद अटक कर यही गल सढ जायगे
फिर आती हें कोई बाढ़ या सुनामी
होकर सवार ऊँची लहरों पर
अटक जाती हें ऊँचे पेढ़ पर और सोचती हें
की यहाँ पर चढ़कर अब सारे जहाँ को देख पायेगी
फिर जब चमकती हें समय की धूप उस धूप की गर्मी से
टूट जाती हें सूखकर वो फिर गिर कर ही समझ पाती हें
की मिटटी से पैदा हुई मिटटी मै मिल जाएगी II
लेखक परवीन चंदर झांझी
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