Tuesday, December 29, 2009

                                   मकसद (AIM)


ऐ जिन्दगी क्यों हें तू मेरे साथ
   तुझसे  मै तेरा मकसद पूछता  हूँ
    वायु मै लेकर सांस खाकर तेरा अनाज   मानता नहीं मै तेरी बात
         तू फिर भी हें मेरे साथ आखिर क्या हें ऐसी बात 
ऐ जिन्दगी क्यों हें तू मेरे साथ तुझसे मै तेरा मकसद पूछता हूँ

पुछा जो मेने फूल से क्यों हें जिन्दगी तेरे साथ 
बोला वो मुझसे हंसकर देनी हें सुगंध मुझको 
इसलीए जिन्दगी हें मेरे साथ
चुकाना हें उसका एहसान बढ़ाकर सुगंध अपनी 
   बस रात दिन मै यही बात सोचता हूँ 

फिर पुछा जो पेढ़ से क्यों हें जिन्दगी तेरे साथ 
खुश होकर बोल पढ़ा वो देने हें फल मुझको 
जीवन का करना हें संचार 
मानता हूँ मै उसका एहसान 
शायद इसी लिए जिन्दगी हें मेरे साथ 

पर्वत से पुछा जो तेरी जिन्दगी तो हें पहाढ़ 
न करता तू किसी से बात 
फिर क्यों हें जिन्दगी तेरे साथ तुझसे मकसद पूछता हूँ 

लेकर गहरी एक साँस बोल उठा पर्वत राज 
सहोंगा नहीं जो मै हिमपात माँ वसुंधरा  को कोन देगा जल की धार
येही हें मकसद मेरे पास शायद इसीलिए जिन्दगी हें मेरे साथ 

फिर पूछा  मेने खुद से जिन्दा हें फूल देने को सुगंध हमको
जिन्दा हें पेढ़ देने को फल हमको जिन्दा हें पर्वत देने को जल हमको 
बदले मै इसके इनके दूंगा क्या मै उनको फिर भी
करते हें हम अहंकार की जिन्दगी हें हमारे साथ
मै खुद से खुद के जीने का मकसद पूछता हूँ   II

              लेखक परवीन चंदर झांझी 
      

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