Thursday, December 24, 2009

                                     किस्मत फूल की

बदकिस्मत है वो फूल
   जो गिरकर किसी डाली से
     बन गया शरदा सुमन किसी शव का

खुश किस्मत है वो फूल
   जो टूटा तो किसी डाली से
      मगर सजकर किसी दुल्हन के जुढ़े मै महक गया

है फितरत फूल की बिखेरना सुगंध
   चाहे वो छुपाये दुर्गन्ध किसी शव की
     या किसी दुल्हन के रूप को महकाने की हो

खोकर  सुगंध कुचला जाना है नियति उसकी
   वो बिस्तर किसी दुल्हन का हो
      या फिर जगह किसी शव के दफ़नाने की हो

गुजरती क्या होगी
  उस  टूटे मुरझाये तनहा फूल पर
     इसकी चिंता क्यों इस बदगुमान ज़माने को हो

है ज़माने की नज़र मै
     फूल की किस्मत यही
          फिर दुःख क्यों उसके टूट कर  कुम्लाह्कर  मुरझा जाने मै हो

                              लेखक  परवीन चंदर झांझी

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