Tuesday, December 22, 2009

                                                         जीवन चक्र

मै भी  था एक बढ़े पेढ़ कि मजबूत शाखा
 मुझ पर खूब पते लगते थे
ठंडी हवा के झोंके मुझे सहला जाते थे
ओस कि बूंदे मुझे गुदगुदा जाती  थी
फूलो के आते ही चहचाहते थे मुझ पर पते
देखकर ख़ुशी उनकी
मेरे चहेरे पर भी मुस्कराहट आती थी
कभी कभी छोटी सी पतजढ़ के बाद
एक लम्भी बहार मुझे बहला जाती थी
मगर नियति कि क्रूर नज़र पढ़ी जब  मुझपर
एक दुष्ट लकढ़हारे न कर दिया मुझे पेढ़ से अलग
बदल कर शाखा से बन गया में काठ
अब न सहलाता था कोई हवा का झोंका
न ओस कि बूंदे मुझे सहलाती थी
तभी तराश कर किसी मूर्ति कार न
कर दिया उस काठ को कठपुतली
और थमा दी ढोर मेरी एक बाज़ीगर के हाथ में
देखा करता हु निर्विकार भाव से
सामने बेठे उन तमाश बीनो को
जो देख मुझे तमाशा बने खुश होते है खूब
इंतजार है बस उस दिन का जब यह
बाज़ीगर और तमाशबीन जायगे मुझ से उब
फ़ेंक देंगे ये मुझे समजकर बेकार
जला देगा कोई मुझे कुढ़I समज कर
मिल जाऊंगा मिटटी में मै बनकर राख
चाहुगा मै कि फिर गिरे कोई बीज उस मिटटी में
बनकर खाद करू मै उस बीज मै जीवन का संचार.     
  
              लेखक   परवीन चंदर झांजी

No comments:

Post a Comment