Thursday, December 24, 2009

                               एक वेश्या कि हार

जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लढ़कर तुझसे
अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है  
जिन्दगी तो है एक वेश्या कि तरह
   कभी हसंती कभी इतराती पास अपने बुलाती है
    कभी हसांती कभी रुलाती और कभी रूठ जाती है 
    मौत है पतिव्रता नारी
     एक बार जो आ जाए तो फिर कही नहीं जाती है
 जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लढ़कर तुझसे

अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है

जिन्दगी चढ़ा था कोठे पर तेरे
लेकर अरमान और हसीन सपने
खूब भटकाया बहलाया फुसलाया तुने
और अब ये है आलम कि आई जब जाने कि बारी
तो  नहीं है कुछ पास अपने
और मौत है इतनी भोली   
कि  फिर ले  लिया मुझको आँचल में उसने अपने
 जबकि है पास मेरे 
सिर्फ कुछ भूली सी यादें या है कुछ टूटे सपने               
जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लढ़कर तुझसे

अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है

जिन्दगी आया था जब पास तेरे
था एक सुंदर बढ़ता शरीर पास मेरे
कुछ  जिन्दादिली के अरमान थे
थे कुछ कर दीखाने के सपने
खूब नाच दिखाए तुने
खूब आँचल लहराए अपने
कभी झन झन करके आई
कभी छुप गयी दिखाकर जलवे अपने   
खूब ललचाया भरमाया हमको  बजाकर गुन्गरू अपने
 अब हूँ जब लाचार बेकार मै तो उत्तार दिया मुझको कोठे से तुने अपने
है मौत अर्धांगनी मेरी
करती है मुजको अब भी अंगीकार
बूढ़ा हूँ लाचार शक्तिवहीँन हूँ करती है फिर भी मुजको वो आज भी सवीकार
समेटती है बाँहों मै अपनी करती नहीं है निराश 
 जिन्दगी बहुत थक गया हू मै लढ़कर तुझसे

अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है

याद रखना थका हुआ हूँ हारा नहीं हूँ
 परेशांन हूँ मगर बेचारा नहीं हूँ
तेरे जुल्मो से झूका हुआ हूँ दुखियारा नहीं हूँ
एक दिन सबक जरूर तुम्हे सिखाऊंगा
जायूँगा जब पास मौत के तुझे साथ लेकर जायूँगा
सामने दुनिया के देखना
इस वेश्या को पत्नी से जरूर हरवाऊंगा
जिन्दगी(वेश्या) बहुत थक गया हू मै लढ़कर तुझसे

अब तो मौत के आगोश में समां जाने को दिल चाहता है

                  लेखक परवीन चंदर झांजी

      


      

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