`शून्य
देखता हूँ मुढ़कर
जिन्दगी कि उस सढ़क पर
पहुंचा हूँ चलकर जिस पर
आज इस मुकाम पर
नज़र आती है बिखरी दूर तक
झाढ़िया बदनामी रिश्तो गमो कि
जो थे कभी मेरे व्यक्तित्व के
एक अटूट अभिन्न हिस्सा
बचा है पास मेरे
जिस्म टूटा बूढ़ा सा
बसी है जिसमे बस एक
आत्मा टूटी रोती सी
चाहता हू पाना छुटकारा
उन भूली बिसरी यादों से
जो देती है न जीने हमको
न देती है मरने हमको
चाहता हँ दिल कि जल्दी
मिल जय वो आग हमको
जो जला दे साथ मेरे
इन रिश्तो कि गन्दी बदबू को
रह जाय देखती दुनिया
जाते हुए एक शून्य में हमको.
लेखक परवीन चंदर झांजी
अंतहीन ख़ामोशी
बनाया था जिन्होंने तमाशा हमारा
वो आज खुद तमाशा बने खढ़े है
दोराहे पर था धकेला हमे जिन्होंने
वो आज खुद चोराहे पर खढ़े है
खूब उढ़ी थी हंसी हमारी
हम बेबसी के आंसू चुपचाप पीकर रह गए
जब आई बारी अपनी
वो तो अभी से घबरा गए
बर्बादी निराशा बेबसी के
जिस गढ़ढ़े में हमे था धकेला
उस गढ़ढ़े की तुमने तो अभी
बस एक झलक ही है पाई
होगे तरह हमारे
बर्बाद एक दिन तुम भी
पाओगे समज उस दिन
है कितनी गहरी ये खाई
लेगी जब घेर तुमको भी
बर्फ अतीत की यादों की
मांगोगे तुम भी उस दिन
बस एक अंत हीन ख़ामोशी ख़ामोशी ख़ामोशी II
लेखक परवीन चंदर झांजी
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