Tuesday, December 22, 2009

                                                        गुजरी राहें

उड़ते  थे कभी हम भी होकर सवार कल्पना के घोड़े  पर
    पड़ते  नहीं थे पावं जमीन पर, सोते थे हम आकांशाओ कि नरम शाया पर
समय के चक्रवात के आकर कुछ इस तरह फंसे जिन्दगी के रेगिस्तान में
    कि अब यह आलम है न सपने हे न आकांशा हे न तमन्ना हे
मुढ़कर भी जब देखते है गुजरी राहों पर
     तो नहीं मिलते अपने पेरों के निशान भी उनपर.
                    लेखक    परवीन चंदर झांजी

                                    खून के रिश्ते
न खुद पर रोये न हालत पर रोये
         यह तो अपनों कि बेवफाई थी जिसने हमें रुला दिया
लढ तो हम अब भी रहे है उन दुश्मनों से
        जो हुए खढ़े  अपनों के पैदा किये हालातो से
हम तो बस छुढ़I रहे है अपने को उन काँटों से
        जिस केक्टुस कि जढ़ों में हमे अब भी कुछ अपने बेठे नज़र आते है
हम अब नहीं जुटा पाते साहस उन  जढ़ों को खोदने का
       क्योंकि उन अपनों के चेरहे फिर सामने खढ़े हो जाते है
मन तो बस यह चाहता है कि जल जाये वो अपने ही जहर से
       मुझे तो बस मिल जाये निजात इन हालात से
न तो उन्हें अपना कह पाता हूँ न इन रिश्तो को भुला पाता हूँ
      अगर होते है यही खून के रिश्ते
तो  ऐ खुदा मुझे ऐसी जमीन देना
              जहाँ के लोगो में खून न हो.


            लेखक  परवीन चंदर झांजी

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