आज फिर (TODAY AGAIN)
आज फिर सपनो के गड मड होकर
याद आ गए कुछ ऐसे चहेरे
जिन्हें मै सोचना नहीं चाहता
चाहे हें वो मेरे अपने
आज फिर मेरे वर्तमान को
याद आ गए कुछ बीते हुए कल
गुम हो गया मेरा आज उस बीते हुए कल में
कयोंकि उस कल में हें मेरे कुछ टूटे हुए सपने
आज फिर क्यों नहीं हें छटता
कोहरा यह बीते कल का
क्यों नहीं हें पनपता सपना आने वाले कल का
क्या सिसकते सिसकते खो जायेगा आज मेरा
उन बीती हुई यादों के कफ़न में II
लेखक परवीन चंदर झांझी
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