अन्गुन्तक तुम कब आओगे (UNKNOWN WHEN WILL YOU COME)
बीत गए हें वर्ष कई मन को खुश हुए
होती है ख़ुशी कैसी शायद यह भूल गया हूँ
हंसा भी कभी तो अपनी ही हंसी को
खुद ही नहीं पहचान पाया लगा कि
कोई दुखियारा शायद कुछ शणो को
अपने दुःख को भूल गया हो
समागम मै किसी गया तो यह ही महसूस हुआ
कि रिश्तो कि कढवाहट को कुछ शन को भूल गया हूँ
अब न तो खुश हूँ न दुखी हूँ
न आशावान न निराश हूँ न उत्साहित हूँ न निरउत्साहित हूँ
जिन्दगी से तटस्थ खढ़ा मै एकटक देख रहा हूँ उस राह पर
ले जाएगी मुझे उस ओर
जहाँ फिर से कुछ गम होंगे तो कुछ खुशिया भी होंगी
होंगी कुछ परेशानिया तो कुछ उत्साह भी होगा
कुछ रिश्तो कि होगी नाराजगी तो
कुछ रिश्तो की गर्मी का एहसास भी होगा
अगर आँखों मै होंगे आंसू तो होठो पर
हंसी का आगाज भी होगा मगर यह तो बताओ
की औंगुन्तक तुम कब आओंगे और बाहं पकढ़कर
उस मंजिल की तरफ कब ले जाओंगे II
लेखक परवीन चंदर झांझी
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